टीका विकास, परीक्षण, और नियमन

टीका विकास एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है, जिसमें कभी-कभी 10-15 वर्ष लग जाते हैं और प्राय: इसमें सरकारी और निजी भागीदारी शामिल होते हैं।

20वीं शताब्दी के दौरान विकसित टीकों के विकास, परीक्षण और नियमन के लिए वर्तमान प्रणाली में समूहों के रूप में उनकी क्रिया विधियों और नियमनों को मानकीकृत करना शामिल है।

सरकारी निगरानी

19वीं शताब्दी के अंत तक, मनुष्यों के लिए अनेक टीकों का विकास किया गया। ये थे स्मॉलपॉक्स, रेबीज, प्लेग, हैजा, और टाइफाइड के टीके। हालांकि, टीके निर्माण का कोई नियमन मौजूद नहीं था। वर्षों तक, अलग-अलग देशों में अलग-अलग विधियों का विकास हुआ ताकि सुनिश्चित हो सके कि टीकों का सुरक्षित रूप से विकास, निर्माण और उपयोग किया जाता है।

यूरोपीय संघ में, यूरोपियन मेडिसिंस एजेंसी टीकों और अन्य दवाओं के नियमन की निगरानी करती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक समिति अंतर्राष्ट्रीय रूप से प्रयुक्त जैविक उत्पादों के लिए अनुशंसाएं सकती है। बहुत से देशों ने अपने खुद के आंतरिक नियामक प्रणालियों के लिए WHO के मानकों को अपनाया है।

टीका विकास और परीक्षण की चरणएं

टीका विकास और परीक्षण में प्राय: चरणों के एक मानकीकृत समुच्चय का अनुपालन किया जाता है। पहली चरण अन्वेषी प्रकृति की होती है। उम्मीदवार टीका ज्यों-ज्यों प्रक्रिया से होकर आगे बढ़ती है, नियमन और निगरानी बढ़ती जाती है।

पहला चरण: प्रयोगशाला और पशु अध्ययन

अन्वेषण चरण

इस चरण में बुनियादी प्रयोगशाला अनुसंधान किया जाता है और इसमें प्राय: 2-4 वर्ष लग जाते हैं। संघीय सरकार द्वारा निधि प्रदत्त अकादमिक एवं सरकारी वैज्ञानिकों ने ऐसे प्राकृतिक या कृत्रिम एंटीजन की पहचान करते हैं जो किसी रोग की रोकथाम या इलाज में मदद कर सकते हैं। इन एंटीजन के अंतर्गत वायरस जैसे कण, दुर्बलीकृत वायरस या जीवाणु, दुर्बलीकृत जीवाणु जनित विष, या पैथोजन से व्युत्पन्न अन्य पदार्थ आते हैं।

क्लिनिकल-पूर्व चरण

क्लिनिकल-पूर्व अध्ययनों में ऊतक-संवर्धन या कोशिका-संवर्धन प्रणालियों का उपयोग और जंतु परीक्षण किया जाता है ताकि उम्मीदवार टीके की सुरक्षा और इसकी अनुक्रिया क्षमता, या प्रतिरक्षा अनुक्रिया को उत्तेजित करने की क्षमता का मूल्यांकन किया जा सके। जंतु सब्जैक्ट के रूप में चूहे और बंदर लिए जा सकते हैं। इन अध्ययनों से शोधकर्ताओं को कोशिकीय अनुक्रियाओं की अवधारणा मिलती है जो मनुष्यों में होने की अपेक्षा की जाती है। वे अनुसंधान के अगले चरण एवं टीका देने की सुरक्षित विधि के लिए एक सुरक्षित शुरुआती खुराक की सलाह दे सकते हैं।

शोधकर्ता क्लिनिकल-पूर्व चरण के दौरान उम्मीदवार टीके का इस्तेमाल कर सकते हैं ताकि इसे अधिक प्रभावी बनाने की कोशिश कर सकें। वे जंतुओं पर चुनौती अध्ययन भी कर सकते हैं, अर्थात वे जंतुओं को टीका लगाते हैं और लक्ष्य पैथोजन से उन्हें संक्रमित करने की कोशिश की जाती है।

बहुत से उम्मीदवार टीके अपनी चरण से आगे नहीं बढ़ पाए क्योंकि वे वांछित प्रतिरक्षा अनुक्रिया उत्पन्न नहीं कर पाए। क्लिनिकल-पूर्व चरणएं प्राय: 1-2 वर्षों तक रहती हैं और इसमें आमतौर पर निजी उद्योग के शोधकर्ता शामिल होते हैं।

आगे के चरण: मानव सब्जैक्ट्स पर चिकित्सा अध्ययन

चरण I टीका के परीक्षण

मनुष्यों में उम्मीदवार टीके मूल्यांकन के इस पहले प्रयास में शामिल है वयस्कों का एक छोटा समूह, प्राय: 20-80 सब्जैक्ट्स। यदि टीका बच्चों के लिए है, तो शोधकर्ता सबसे पहले वयस्कों पर परीक्षण करेंगे, और फिर टेस्ट ऑब्जैक्ट की कम आयु की तरफ आते जाएंगे जब तक किए वे अपने लक्ष्य तक न पहुंच जाएं। चरण I के परीक्षण नन-ब्लाइंडेड (जिसे ओपन-लेबल भी कहा जाता है जिसमें शोधकर्ता और शायद सब्जैक्ट को यह पता होता है कि टीका का या प्लेसिबो का इस्तेमाल किया जा रहा है) हो सकते हैं।

चरण I के परीक्षणों के लक्ष्य हैं उम्मीदवार टीके की सुरक्षितता का मूल्यांकन करना और टीका द्वारा उत्तेजित की जाने वाली प्रतिरक्षा अनुक्रिया के प्रकार और सीमा का निर्धारण करना। चरण 1 के भरोसेमंद परीक्षण को अगली चरण में ले जाया जाएगा।

चरण II टीका के परीक्षण

चरण II परीक्षण में कई सौ व्यक्तियों के एक विशाल समूह को शामिल किया जाता है। कुछ व्यक्ति उन समूहों से संबंधित होते हैं जिन्हें रोग लगने का खतरा होता है। ये परीक्षण यादृच्छिक (रैंडमाइज्ड) होते हैं और नियंत्रित होते हैं, और इसमें एक प्लेसिबो समूह शामिल होता है।

चरण II परीक्षण के लक्ष्य हैं उम्मीदवार टीके की प्रभाविता, प्रतिरक्षा अनुक्रिया क्षमता, प्रस्ताविक खुराकों, प्रतिरक्षण की समय-सारणी, और टीका प्रदान करने की विधि का अध्ययन करना।

चरण III टीका के परीक्षण

सफल चरण II उम्मीदवार टीकों को बड़े पैमाने पर परीक्षण के लिए तैयार किया जाता है, जिसमें हजारों से लेकर दसियों हजार लोग शामिल होते हैं। चरण III के ये परीक्षण यादृच्छिक होते हैं और डबल ब्लाइंड होते हैं और इनमें प्रायोगिक टीकों की जांच प्लेसिबो (प्लेसिबो एक सेलाइन का घोल हो सकता है, दूसरे रोग के लिए एक टीका, या कोई और पदार्थ) के सापेक्ष में की जाती है।

चरण III का एक उद्देश्य होता है लोगों के विशाल समूह में टीका सुरक्षा का मूल्यांकन करना। हो सकता है कि पिछले चरण में परीक्षित सब्जैक्टों के छोटे समूह में कुछ विरले दुष्परिणामों का पता न चले। उदाहरण के लिए, मान लें कि उम्मीदवार टीके के संबंध में कोई प्रतिकूल घटना प्रत्येक 10,000 लोगों में 1 में हो सकती है। कम आवृत्ति वाली घटना के लिए महत्वपूर्ण अंतर की पहचान के लिए, परीक्षण में 60,000 सब्जैक्टों को शामिल करना होगा, उनमें से आधा कंट्रोल में, या टीका नहीं दिए जाने वाले समूह में होते हैं (प्लॉटकिन SA एवं अन्य Vaccines, 5वां संस्करण, फिलाडेल्फिया: साउंडर्स, 2008). 

टीके की प्रभावित की भी जांच की जाती है। इन कारकों में ये शामिल हो सकते हैं 1) क्या उम्मीदवार टीका रोग की रोकथाम करता है? 2) क्या यह पैथोजन के संक्रमण से सुरक्षा देता है? 3) क्या इससे एंटीबॉडीज या पैथोजन से जुड़ी अन्य प्रकार की प्रतिरक्षी अनुक्रियाओं का निर्माण होता है?

आगे के चरण: अनुमोदन और लाइसेंस की प्रक्रिया

चरण III के परीक्षण के सफल होने के बाद, टीका निर्माता सक्षम नियामक निकाय से टीके के लिए लाइसेंस की मांग करेगा। लाइसेंस की प्रक्रिया में प्राय: अध्ययन दस्तावेज की सावधानीपूर्वक समीक्षा और फैक्ट्री का निरीक्षण जहां टीके का निर्माण होगा और टीके के लेबलिंग का अनुमोदन किया जाता है।

लाइसेंस मिल जाने के बाद, नियामक निकाय लगातार टीके के निर्माण की निगरानी करते हैं, जिसके अंतर्गत संस्थानों का निरीक्षण करना और टीके के प्रभाव, सुरक्षा और शुद्धता के लिए निर्माता द्वारा टीकों के खेपों के परीक्षण की समीक्षा करना शामिल है। नियामक निकाय निर्माताओं के टीकों की अपनी तरह से जांच कर सकते हैं।

लाइसेंस के बाद टीकों की निगरानी

विभिन्न प्रकार की प्रणालियां टीकों के मान्यता प्राप्त होने के बाद निगरानी करती हैं। इनमें चरण IV परीक्षण और लाइसेंस के बाद की निगरानी प्रणालियां शामिल होती हैं।

चरण IV के परीक्षण वैकल्पिक अध्ययन होते हैं जिन्हें दवा कंपनियां टीके के जारी होने के बाद कर सकती हैं। निर्माता भी टीके की सुरक्षा, प्रभावकारिता और अन्य संभावित इस्तेमाल के लिए जांच जारी रख सकता है।

बहुत से देशों ने लाइसेंस के बाद की सुरक्षा निगरानी के लिए प्रणालियां स्थापित की है। कुछ प्रणालियों में शामिल है निष्क्रिय (पैसिव) निगरानी, या कुछ स्थानों पर इसे सहज रिपोर्टिंग भी कहते हैं। इसका अर्थ है कि प्रतिरक्षण के बाद संदिग्ध प्रतिकूल घटनाओं की जानकारी घटना में शामिल इकाइयों द्वारा दी जा सकती है, लेकिन ये रिपोर्ट्स विशेष रूप से निगरानी प्रणालियों द्वारा नहीं ढ़ूंढ़े जाते हैं। अन्य प्रणालियों के अंतर्गत सक्रिय निगरानी आती है, अर्थात प्रतिरक्षण के बाद प्रतिकूल घटनाओं के बारे में सक्रिय रूप से डेटा इकट्ठा करने की विधियां कार्यरत होती हैं। WHO उन देशों को यह प्रणाली स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित करता है जिनके पास लाइसेंस के बाद की टीका सुरक्षा प्रणालियां नहीं होती। यह विभिन्न देशों से ली गई टीका सुरक्षा जानकारी के साथ एक वैश्विक डेटाबेस का भी प्रबंधन करता है।

निष्कर्ष में

टीकों का विकास, परीक्षण और नियमन उन्हीं तरीकों से की जाती है जैसा कि अन्य दवाओं के लिए निर्धारित होते हैं। आमतौर पर, टीकों का परीक्षण गैर-टीका दवाओं की तुलना में प्राय: पूर्ण रूप से किया जाता है क्योंकि टीके के चिकित्सीय परीक्षणों में मानव सब्जैक्ट की संख्या प्राय: बहुत अधिक होती है। इसके अलावा, लाइसेंस के बाद की सुरक्षा के लिए टीकों की गहन निगरानी की जाती है।


स्रोत

Understanding Vaccine Trials: How Are AIDS Vaccines Tested? IAVI Report. Volume 1, no. 1. 10/3/2017 को प्रयुक्त।

Plotkin SA, Orenstein WA, Offit PA, eds. Vaccines, 5th ed. Philadelphia: Saunders, 2008. Chapters 3 and 73.

The Children’s Vaccine Initiative: Achieving the Vision. National Academies Press.

Vaccine Product Approval Process. Food and Drug Administration (FDA). 10/3/2017को प्रयुक्त।

विश्व स्वास्थ्य संगठन। Global Vaccine Safety. Adverse Events after Immunization Detection. 10/3/2017 को प्रयुक्त।

अंतिम अपडेट 10 मार्च 2017