रोग उन्मूलन

जब कोई रोग किसी क्षेत्र में फैलना बंद कर देता है, तो उसे उस क्षेत्र में रोग का उन्मूलन माना जाता है। उदाहरण के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने व्यापक टीकाकरण अभियान चलाने के बाद वर्ष 2014 में पोलियो के उन्मूलन की घोषणा कर दी है।[1]

यदि दुनिया भर से एक विशेष रोग समाप्त हो जाता है, इसे उन्मूलित कहा जाता है। अबतक मानव समुदाय को प्रभावित करने वाला केवल एक रोग उन्मूलित किया जा सकता है।*वर्ष 1980 में विश्व स्वास्थ्य संगठन के दशकों के चलाए प्रयास के बाद वर्ल्ड हेल्थ असेम्बली ने बयान जारी किया कि स्मॉलपॉक्स का उन्मूलन हो चुका है। समंवित प्रयास ने दुनिया को उस रोग से छुटकारा दिलाया, जिसने 35% लोगों को मौत की नींद सुला दी थी और कइयों को शारीरिक नुकसान पहुंचाया और अंधा बना दिया था।

स्मॉलपॉक्स के उन्मूलन में एक केंद्रित निगरानी का संयोजन शामिल था - यानी नए स्मॉलपॉक्स केस की तुरंत पहचान करना - और रिंग टीकाकरण आरंभ करना। “रिंग टीकाकरण” का अर्थ होता है कि जिस किसी को स्मॉलपॉक्स हो सकता है उसकी तलाश कर उसे जल्द से जल्द टीका लगाना, रोग का एक स्थान से आगे नहीं बढ़ने देना और इसके प्रसार को रोकना। अंतिम बार स्मॉलपॉक्स की घटना वर्ष 1977 में सोमालिया में देखी गई थी।

स्मॉलपॉक्स के उन्मूलन के कई अहम कारण थे। पहला, यह रोग स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है: इसके रोगी में एक चकत्ता उभर आता है जिसे आसानी से पहचाना जा सकता है। इसके अलावा इसके रोग के उभरने और प्रारंभिक लक्षणों के प्रकट होने तक का समय काफी अल्प होता है, जिससे यह रोग प्रायः पकड़ में आने तक काफी दूर तक नहीं फैल सकता है। WHO के कार्यकर्ता बाहरी सीमाओं वाले इलाकों में रोगियों की तलाश स्मॉलपॉक्स के चकत्ते की तस्वीर दिखाकर करते थे और लोगों से ऐसे ही चकत्ते वाले व्यक्ति के बारे में सूचना एकत्र करते थे।

दूसरा, स्मॉलपॉक्स केवल मनुष्य में हो सकता और फैल सकता है। कुछ रोगों के लिए जंतु आश्रय होते हैं, जिसका अर्थ यह है कि वे मनुष्य के अलावा अन्य प्रजातियों के जीवों को भी संक्रमित कर सकते हैं। उदाहरण के लिए पीत ज्वर मानव को संक्रमित करता है, पर यह बंदर को भी सक्रमित कर सकता है। यदि कोई मच्छर पीत ज्वर के शिकार किसी बंदर को काटता है, तो बंदर से वह रोग मनुष्य में भी आ सकता है। इसलिए चाहे धरती की समूची जनसंख्या का पीत ज्वर से रक्षा के लिए किसी तरह से टीकाकरण कर दिया जाए, पर इसकी उन्मूलन की गारंटी नहीं होती। यह रोग उसके बाद भी बंदरों में फैल सकता है और लोगों की प्रतिरक्षी क्षमता के कमजोर पड़ते ही उनमें फिर से प्रवेश कर सकता है। (पीत ज्वर के लिए किसी जीव आश्रय की खोज होने के कारण ही 1900 के आरंभिक दौर में पीत ज्वर के उन्मूलन को झटका लगा था।) हालांकि स्मॉलपॉक्स केवल मनुष्य को ही प्रभावित कर सकता है। मनुष्य की आबादी को छोड़कर यह कहीं और नहीं छुप सकता है।

उसी प्रकार व्यक्तियों को संक्रमण से बचाने की क्षमता भी उतनी ही अहम होती है। जिन लोगों को स्मॉलपॉक्स हो जाता है, वे कुदरती तौर से जीवन काल तक भविष्य में इस रोग के खिलाफ प्रतिरक्षा विकसित कर लेते हैं। टीकाकरण हर किसी के लिए अत्यंत प्रभावी होता है। WHO ने वैक्सीनेटरों को तेजी से प्रशिक्षित किया और वे अल्प समय में लोगों के बड़े समूह को प्रतिरक्षित कर सके।

स्मॉलपॉक्स के उन्मूलन से उम्मीद जगी कि ऐसा ही अन्य रोगों के साथ भी किया जा सकता है, जैसे कि: पोलियो, गलकंड तथा ड्रैकंकुलसिसि (गिनीवर्म रोग) इत्यादि। मलेरिया को भी ध्यान में रखा गया है और कई देशों में इसके मामले काफी तेजी से घटे हैं। हालांकि यह उन्मूलन के पारंपरिक विचार को चुनौती देता है, क्योंकि मलेरिया के होने से जीवन काल के लिए इसके खिलाफ प्रतिरक्षी क्षमता विकसित नहीं होती (जैसा कि स्मॉलपॉक्स और कई अन्य रोगों के साथ होता है)। मलेरिया से व्यक्ति कई बार बीमार पड़ सकता है, हालांकि कई हमलों के पाद उसके शरीर में आंशिक रूप से प्रतिरक्षी क्षमता का विकास हो सकता है। इसके अलावा, उम्मीद जगाने वाले कई कदम उठाए गए हैं, पर अबतक मलेरिया के लिए कोई प्रभावी टीका अबतक नहीं आ पाया है।

अन्य रोग अतिरिक्त चुनौतियां पेश करते हैं। भले ही कई देशों में व्यापक टीकाकरण द्वारा पोलियों का उन्मूलन हो चुका है, पर यह कुछ स्थानों में अभी भी मौजूद है क्योंकि (कुछ अन्य कारणों से) कई मामलों में आसानी से दिखाए पड़ने वाले लक्षण नहीं उभरते। परिणामस्वरूप किसी संक्रमित व्यक्ति की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता, और इस प्रकार यह विषाणु दूसरे व्यक्तियों में भी फैल जाता है। खसरा भी कुछ इसी तरह से परेशानी पैदा करता है: भले ही इस रोग में स्पष्ट रूप से एक चकत्ता उभर आता है, पर कई बार इसके संक्रमण के संपर्क में आने और स्पष्ट लक्ष्ण उभरने तक एक महत्वपूर्ण समयावधि जा चुकी होती है। जिससे रोगी चकत्ता उभरने से पहले ही संक्रामक हो जाता है और रोग की पहचान होने से पूर्व ही यह दूसरे लोगों में भी फैल सकता है।

गिनी वर्म रोग उन्मूलन की कगार पर है। वर्ष 2015 में इसके केवल 22 मामले मिले हैं और वे भी केवल चार देशों (चाड [9 मामले], इथियोपिया [3 मामले], माली [5 मामले ], तथा दक्षिण सूडान [5 मामले])में पाए गए हैं। [2] द कार्टर सेंटर इंटरनेशनल टास्क फोर्स फॉर डिजीज इरैडिकेशन ने छह अतिरिक्त रोगों को संभावित रूप से उन्मूलन योग्य घोषित किया है, जो इस प्रकार हैं: लिम्फथैटिक फाइलेरियासिस (हाथी पांव रोग), पोलियो, खसरा, गलकंड रोग, रुबेला और पोर्क टेपवर्म। [3]

*रिंडरपेस्ट एक ऐसा रोग होता है जो मवेशियों कोइ प्रभावित करता है; इसे भी मुख्य रूप से टीकाकरण द्वारा ही उन्मूलित कर दिया गया है।[4]


स्रोत

1.     विश्व स्वास्थ्य संगठन। Polio-free certification: WHO South-East Asia. 2014. 31/3/2017 को प्रयुक्त।

2.     The Carter Center. Guinea worm case totals. 31/3/2017 को प्रयुक्त।

3.     The Carter Center. Disease considered as candidates for global eradication by the International Task Force for Disease Eradication. 31/3/2017 को प्रयुक्त।

4.     World Organisation for Animal Health. 2011: Global rinderpest eradication. 31/3/2017 को प्रयुक्त।

 

अंतिम अपडेट 31 मार्च 2017