क्या टीकाओं के कारण ऑटिज्म होता है?

ऑटिज्म की दर बहुत से देशों में पिछले 20 साल में बहुत तेजी से बढ़ी है। अमेरिका में 1992 में पैदा हुए बच्चों में 150 में से 1 बच्चे में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसॉर्डर (एएसडी) पीड़ित पाया गया। 2004 में पैदा हुए बच्चों में से 68 में 1 बच्चे में एएसडी पाया गया।[1] 1990 के दशक की ऑटिज्म दर की तुलना 1940 के दशक से लेकर 1980 के दशक तक से करना मुश्किल है: पहले के वर्षों में ऑटिज्म मूल रूप से बहुत ही गंभीर रूप से प्रभावित व्यक्तियों (बच्चों) से जुड़ा था और ऑटिज्म की दर का आकलन 10, 000 लोगों में से 1 थी।[2] 1990 के दशक से शुरू हुई ऑटिज्म के बारे में हमारी समझ बहुत विस्तारित हुई है और अब ऐसे लोगों को भी ऑटिज्म के तहत माना जाता है जिन्हें पहले ऑटिज्म से मुक्त माना जाता और अब उन्हें ASDs के एक प्रकार के तहत वर्गीकृत किया जा सकता है।[3]

जबकि आज ऑटिज्म की ऊंची दर डायग्नोसिस और रिपोर्टिंग में सुधार,ऑटिज्म की बदलती परिभाषा, अथवा एएसडी के होने की घटना में वृद्धि के कारण है यह ज्ञात नहीं है।[4],[5] बहरहाल, शोधकर्ताओं और चिंतित अभिभावक दोनों ने ही ऑटिज्म के कारणों को लेकर अटकलें, लगाई हैं और इस समस्या का व्यापक अध्ययन किया गया है। एएसडी के अन्य संभावित जोखिम कारकों के साथ टीकाकरण की भूमिका पर सवाल उठे हैं, जैसे कि आनुवंशिक रुझान, अधिक उम्र में माता-पिता बनना, तथा अन्य पर्यावरणीय कारक। एएसडी के संभावित अन्य कारकों की तुलना में टीकाओं के बारे में शायद बहुत जांच-पड़ताल हुई है, और वैज्ञानिकों, फिजिशियनों तथा जन स्वास्थ्य शोधकर्ताओं की एक बड़ी संख्या इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि टीकाओं और ऑटिज्म के बीच कोई संबंध नहीं है।[6] कुछ, हालांकि अभी भी सवाल करते हैं कि क्या एएसडी के विकास में टीकाकरण की कोई भूमिका है और इसलिए सार्वजनिक स्वास्थ्य चिकित्सा प्रतिष्ठानों ने इन चिंताओं का निदान करना जारी रखा है।

एमएमआर अवधारणा

टीकाओं को ऑटिज्म के कारण के रूप में मानने के प्रवृत्ति पर सवाल 1990 के दशक में शुरु हुआ। 1995 में, ब्रिटिश शोधकर्ताओं का एक समूह ने Lancet में एक काउहोट अध्ययन प्रकाशित की जो दर्शाता है कि जिन व्यक्तियों का खसरा-गलसुआ-रुबेला (एमएमआर) के लिए टीकाकरण किया गया था उनके उन व्यक्तियों की तुलना में ऊदरीय रोगों से पीड़ित होने की संभावना अधिक पाई गई जिन्हें एमएमआर नहीं दिया गया था।[1] इनमें से एक शोधकर्ता थे गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट एण्ड्रू वेकफील्ड, एमडी, जिन्होंने टीका और ऊदरीय रोगों के बीच संबंध पर आगे अध्ययन किया और उनका अंदाजा था कि टीका के वायरस से लगातार संक्रमित होने से आंत के ऊतकों में विदारण होता है जिससे ऊदरीय रोग और न्यूरोसाइकिएट्रिक रोग (खास कर ऑटिज्म) होता है। इस अवधारणा का एक भाग, कि ऑटिज्म का संबंध टीका से है, का सुझाव पहले के कुछ शोधकर्ताओं ने दिया था। उदाहरण के लिए, फंडेनबर्ग ने मुख्यधारा से अलग के किसी शोधपत्र में प्रकाशित अपने एक छोटे से प्रायोगिक अध्ययन में इस संबंध को मान्यता दी[8], जैसा कि गुप्ता ने ऑटिज्म के संभावित चिकित्सा की समीक्षा में किया था।[9] जब वेकफील्ड द्वारा इसकी पड़ताल करने तक इस अवधारणा का व्यवस्थित रूप से अध्ययन नहीं किया गया था।

 

1998 में वेकफील्ड ने 12 सहयोगी लेखकों के साथ The Lancet में एक केस सिरीज अध्ययन प्रकाशित कराया जिसमें दावा किया गया था कि उनके द्वारा एमएमआर टीकाकरण के बाद ऑटिज्म के लक्षण दर्शाने वाले बच्चों के पाचन तंत्र में खसरा वायरस पर किए गए  12 अध्ययनों में उन्हें प्रमाण मिले।[10] हालांकि शोधपत्र में उन्होंने कहा कि वे एमएमआर टीकाकरण और ऑटिज्म के बीच कोई औपचारिक संबंध नहीं दिखा पाए, लेकिन वेकफील्ड ने शोधपत्र पर के साथ जारी हुए एक वीडियो रिलीज में यह सुझाया कि एमएमआर टीकाकरण और ऑटिज्म के बीच औपचारिक संबंध है: “...इस सिंड्रोम [जिसे वेकफील्ड ने ऑटिज्म एंटेरोकोलाइटिस नाम दिया] का जोखिम समन्वित टीका, एमएमआर से जुड़ा है न कि एकल टीकाओं से।"[11] उन्होंने फिर अनुशंसा की कि एमएमआर समन्वित टीका को एकल-एंटीजेन वाले टीकाओं के पक्ष में समय के साथ अलग-अलग दिया जाना चाहिए। (एक एकल-एंटीजेन खसरा वैक्सीन के लिए 1997 में वेकफील्ड ने खुद एक पेटेंट के लिए आवेदन दिया और इस नजरिए में संभावित वित्तीय हित भी झलकता है।[12]

वेकफील्ड प्रकाशन पर प्रतिक्रिया तुरंत आने लगी। प्रेस आउटलेट ने इन खबरों को व्यापक रूप से कवर किया और इससे ब्रिटेन और अमेरिका में अभिभावकों ने अपने बच्चों को टीका दिलाने में टालमटोल करने लगे या टीकाकरण को पूरी तरह नकार ही दिया। एमएमआर टीकाकरण की दर में तेजी से गिरावट आई।[13]

अगले बारह सालों में एमएमआर और ऑटिज्म के बीच संभावित संबंध पर गहन अध्ययन हुआ। किसी भी प्रतिष्ठित और प्रासंगिक अध्ययन ने वेकफील्ड के निष्कर्षों का समर्थन नहीं किया, बल्कि कई सारे बेहतरीन अध्ययनों में एमएमआर और ऊदरीय रोगों अथवा एमएमआर और ऑटिज्म के बीच कोई संबंध नहीं पाया गया।[6],[14]

2004 में, The Lancet के तात्कालिक एडिटर डॉ. रिचर्ड हॉर्टन ने लिखा कि वेकफील्ड को अपने जर्नल में यह रहस्य भी खोलना चाहिए था कि उसे टीका निर्माताओं के खिलाफ मुकदमा चलाने को इच्छुक वकीलों द्वारा धन दिया गया था।[15] टेलीविजन साक्षात्कार में, हॉर्टन ने दावा किया कि वेकफील्ड के शोध में “भारी कमियां” थीं।[16] अध्ययन के अधिकतर सह-लेखकों ने शोधपत्र के निषकर्षों से किनारा कर लिया[17], और 2010 में The Lancet ने शोधपत्र को ही खारिज कर दिया।[18]

इस प्रत्यावर्तन के तीन महीने बाद मई 2010 में, ब्रिटेन के जेनरल मेडिकल काउंसिल ने वेकफील्ड को ब्रिटेन में डॉक्टरी की प्रैक्टिस करने से रोक दिया यह कहते हुए कि उसके शोध में बच्चों की “खतरनाक अवहेलना” हुई। काउंसिल ने उस बात पर से भी पर्दा उठा दिया जिसका कभी दुनिया को पता नहीं था कि वेकफील्ड के शोध को उन वकीलों से धन मिला था जो टीका निर्माताओं पर ऑटिज्म पीड़ित बच्चों के अभिभावकों की ओर मुकदमा चलाना चाहते थे।[19]

6 जनवरी 2011 को BMJ  ने ब्रिटिश पत्रकार ब्रायन डियर की एक रिपोर्ट प्रकाशित की जिसने पहले वेकफील्ड के शोधकार्य की खामियों के बारे में बताया था। इस नई रिपोर्ट के लिए, डियर ने परित्यक्त शोध के अभिभावकों और बच्चों से बात की पाया कि वेकफील्ड ने बच्चों की स्थिति के बारे में अपने शोध में झूठे आंकड़े दिए थे।[20]

 

विशेष तौर पर, डियर ने यह रिपोर्ट दी कि जहां शोधपत्र ने अध्ययन के बारह बच्चों में से आठ बच्चों में टीकाकरण के बाद जठरांत्रीय (गैस्ट्रोइंटेस्टिनल) या ऑटिज्म जैसे लक्षणों के पाए जाने का दावा किया, वहीं इसके उलट रिकॉर्ड बताते हैं कि अधिकतम दो  बच्चों में ही इस दौरान ये लक्षण पाए गए थे। इसके अलावा, जहां शोधपत्र ने यह दावा किया कि सभी बारह बच्चे एमएमआर टीकाकरण से “पहले सामान्य” थे, कम से कम दो का मानसिक विकास उनके रिकॉर्ड के अनुसार टीकाकरण के होने के पहले ही सुस्त था।

 

सभी बारह बच्चों के रिकॉर्ड की जांच करने के बाद डियर ने पाया कि शोधपत्र में की गई घोषणाएं किसी भी श्रेणी: यानी, रिग्रेसिव ऑटिज्म वाले बच्चे; गैर-विशिष्ट कोलाइटिस; या एमएमआर टीकाकरण होने के बाद के दिनों में प्रथम लक्षण वाली श्रेणियों के लिए रिकॉर्ड में दी गई संख्याओं से मेल नहीं खातीं। The Lancet शोधपत्र ने दावा किया कि छह बच्चों में ये तीनों स्थितियां पाई गईं; जबकि रिकॉर्ड के अनुसार एक भी बच्चे में ऐसा नहीं था। (“रॉयल फ्री अस्पताल के विवरणों के साथ एनएचएस रिकॉर्ड में दिए गए विवरणों के साथ The Lancet शोधपत्र के 12 बच्चों की तीन विशेषताओं की तुलना” नामक तालिका देखें जिसमें The Lancet के आंकड़ों और डियर आलेख यहां के आंकड़ों की तुअलना की गई है।)

 

इसके बाद प्रकाशित एक संपादकीय में BMJ के प्रधान संपादक फियोना गोडली और सह-लेखिका जेन स्मिथ और हार्वे मार्कोविच ने बिना नियंत्रण समूह वाले अभिभावकीय आह्वान पर आधारित लघु अध्ययन द्वारा सार्वजनिक स्वास्थ्य को हुए नुकसान का अध्ययन किया - यह ऐसा अध्ययन था जिसने जो पूरी तरह झूठ पर आधारित था, लेकिन इसका प्रभाव आज भी मौजूद है।[21]

हालांकि वेकफील्ड के शोधपत्र के निष्कर्षों को वैज्ञानिकों ने बहुत पहले खारिज कर दिया था, लेकिन आंकड़ों के झूठे होने के प्रमाण ने BMJ द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट को टीका के इतिहास का एक युगांतरकारी क्षण बना दिया है। इस बात के पुख्ता प्रमाण हैं कि मूल अध्ययन को न केवल इस कारण प्रकाशित नहीं कराया जाना चाहिए था कि यह खराब तरीके से संचालित था बल्कि इसलिए कि यह शोध में जालसाजी का परिणामा था।

The Thimerosal अवधारणा

एमएमआर एकमात्र ऐसा टीका या टीका घटक नहीं है जिसे उन लोगों का कोपभाजन बनना पड़ा जिन्हें लगता है कि ऑटिज्म का संबंध टीकाकरण से है। एमएमआर विवाद के थमने के बाद, आलोचकों ने अपने सवालों का रुख thimerosal (थीमेरोसल) की ओर मोड़ दिया जो एक मर्क्युरी-कोटिंग प्रिजर्वेटिव है जिसका इस्तेमाल कुछ टीकाओं में किया जाता है। (थीमेरोसल का इस्तेमाल एमएमआर में कभी नहीं किया गया, क्योंकि एंटीमाक्रोबियल कारकों का इस्तेमाल लाइव टीकाओं में नहीं किया जाता है।[22]

1990 के दशक के अंतिम दिनों में कानून निर्माताओं, पर्यावरणवादियों और चिकित्सीय एवं सार्वजनिक स्वास्थ्यकर्मियों को जीव-जंतुओं, खासकर मछलियों के मर्क्युरी के संपर्क में आने की चिंता हुई। ऐसे संभावित हानिकारक संपर्क के प्रभावों को जानने पर पुरजोर ध्यान देने के लिए यू.एस. फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) ने 1999 में अनुरोध किया कि ड्रग कंपनियां अपने प्रॉडक्ट में मर्क्युरी की मात्रा के बारे में रिपोर्ट दें। थीमेरोसल के रूप में टीकाओं में मर्क्युरी के परिणामों ने मछलियों के पारे के संपर्क में आने के बारे में एफडीए के दिशानिर्देशों को विस्तार दिया। मछलियों में मर्क्युरी मिथाइलमर्क्युरी के रूप में पाया जाता है, जिसका तुरंत उपापचय नहीं होता और वह मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर जाता है। इससे कुछ स्तरों पर न्यूरोलॉजिकल असर जैसे उच्च हानिकारक प्रभाव पड़ता है। थीमेरोसल में पाया जाने वाले मर्क्युरी का शरीर में इथाइलमर्क्युरी के रूप में उपापचय होता है जो एक ऐसा यौगिक है जिसपर तब व्यापक शोध नहीं हो पाया था, जिसे मिथाइलमर्क्युरी की तुलना में कम हानिकारक समझा जाता था।[23]

एफडीए अंधेरे में था: इथाइलमर्क्युरी के संपर्क स्तर को लेकर कोई अनुशंसा नहीं थी। क्या मिथाइलमर्क्युरी के लिए दिए गए दिशा निर्देशों को इथाइलमर्क्युरी के लिए अपनाया जाए? क्या बच्चों के टीकों में मर्क्युरी की मौजूदगी चिंता का विषय था? इन सवालों का जवाब देने में असमर्थता और साथ ही अमेरिकन अकैडमी ऑफ पेडिएट्रिक्स तथा अन्य समूहों के साथ मिलकर टीका कंपनियों से आह्वान किया गया है वे टीकाओं में थीमेरोसल का उपयोग कम करें या बंद कर दें। इसके अलावा, अध्ययनों की योजना इस बात का पता लगाने के लिए बनाई गई थी कि टीकाओं में मौजूद मर्क्युरी की मात्रा के संपर्क में आने से बच्चों पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है या नहीं।

एक्टीविस्ट और अन्य लोग इस बिंदु पर थीमेरोसल से सुरक्षा को लेकर चिंता में पड़ गए और उन्होंने इस मत को मान्यता दे दी कि ऑटिज्म टीका में पाए जाने वाली मर्क्युरी के संपर्क में आने से हो सकता है। इस्टीट्यूट ऑफ मेडिसिन ने इस मुद्दे पर एक समग्र सुरक्षा समीक्षा आयोजित कराई। 2001 में प्रकाशित उनकी प्राथमिक रिपोर्ट में यह बताया गया कि समिति को इस बात का समर्थन या विरोध करने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं मिले कि टीकाओं में मर्क्युरी की मौजूदगी और न्यूरोडेवलपमेंटल डिसॉर्डर के बीच कोई नियमित संबंध है।[24] हालांकि, 2004 में प्रकाशित उनकी अंतिम रिपोर्ट में इस निष्कर्ष पर पहुंचा गया कि 2001 से इस प्रश्न पर एकत्र परिणामों की भरपूर मात्रा से यह जाहिर होता है कि वह अवधारणा गलत है जिसमें टीकाओं में मौजूद मर्क्युरी को न्यूरोडेवलपमेंटल डिसॉर्डर के लिए जिम्मेवार माना जाता है।[6] तब से, अनेक अध्ययनों के प्रमाण ने थिमेरोसल और ऑटिज्म के बीच संबध को खारिज करने के पक्ष में समर्थन देना जारी रखा है।[25], [26]

अन्य अवधारणाएं

जिन देशों में ज्यादार टीकाओं से थीमेरोसल को हटा दिया गया है, उनमें ऑटिज्म की दर में कोई गिरावट नहीं आई। बल्कि, वहां इसमें वृद्धि ही हुई है।[1] टीका के कुछ आलोचकों ने अपना ध्यान मर्क्युरी के संपर्क/ऑटिज्म संबंध से हटाकर अन्य लक्ष्यों की ओर लगाया। ऐसा ही एक लक्ष्य है बच्चों को लगाई जाने वाली टीकाओं की संख्या। 1980 के दशक से बहुत सी टीकाओं को बच्चों के प्रतिरक्षण के लिए शामिल किया गया है और कुछ आलोचक इस बात को लेकर चिंतित हैं कि इतनी अधिक संख्या में टीका लगवाने के कारण ऑटिज्म की दर बढ़ी हो सकती है। हालांकि,अधिक संख्या में टीका लगवाने के कारण ऑटिज्म की दर में वृद्धि का कोई प्रमाण नहीं मिला है।[27] दूसरे लोगों ने ऑटिज्म के संभावित कारण के रूप में कुछ टीकाओं में मौजूद एल्युमिनियम एडजुवेंट पर ध्यान केंद्रित किया है। यद्यपि, टीकाओं में प्रयुक्त एल्युमिनियम की मात्रा एल्युमिनियम के संपर्क में आने के अन्य उदाहरणों की तुलना में बहुत ही नगण्य है, जैसे कि स्तन पान और शिशु फॉर्म्युला। टीकाओं में मौजूद एल्युमिनियम के कारण कोई शिशु या बाल रोग के होने के बात सामने नहीं आई है।[28]

निष्कर्ष

ज्यादातर वैज्ञानिक और चिकित्सा विशेषज्ञ इस बात से संतुष्ट हैं कि टीका और ऑटिज्म तथा अन्य न्यूरोडेवलपमेंटल डिसॉर्डर के बीच कोई संबंध नहीं है। तब भी, आलोचकों ने इस मुद्दे पर सवाल खड़े करना जारी रखा है। न केवल वे एमएमआर और थीमेरोसल तथा ऑटिज्म के बीच संबंध पर सवाल उठाते हैं बल्कि ऑटिज्म के होने के संदर्भ में भूमिका निभाने वाले अन्य संभावित दोषियों को भी सामने लाते हैं। शोधकर्ताओं ने इन सवालों का परीक्षण करना जारी रखा है, लेकिन कोई ऐसा प्रमाण नहीं है जो ऑटिज्म के विकास में इन कारकों के जिम्मेदार होने की बात साबित करता हो। ज्यादातर ऑटिज्म शोधकर्ता यह मानते हैं कि ऑटिज्म के कारण बहुत सारे हैं जिनमें अनुवांशिक और पर्यावरणीय कारक भी शामिल हैं, लेकिन टीका इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं।[4],[5]

 

स्रोत

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  22. विश्व स्वास्थ्य संगठन। Thimerosal in vaccines. July 2006. 9/3/2017 को प्रयुक्त।
  23. Most of this narrative refers to the facts and chronology outlined in the Food and Drug Administration’s Publication Thimerosal in Vaccines.
  24. Immunization Safety Review Committee, Institute of Medicine. (2001) Immunization safety review: measles-mumps-rubella vaccine and autism. National Academies Press. 9/3/2017 को प्रयुक्त।
  25. सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन। Science summary: CDC studies on vaccines and autism. 9/3/2017 को प्रयुक्त।
  26. American Academy of Pediatrics. Vaccine safety: examine the evidence. (122KB). Updated April 2013. 9/3/2017 को प्रयुक्त।
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  29. सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन। Autism spectrum disorder (ASD). Research. 9/3/2017 को प्रयुक्त।
  30. National Institutes of Health. National Institute of Neurological Disorders and Stroke. Autism spectrum disorder fact sheet. 9/3/2017 को प्रयुक्त।

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अंतिम 9 मार्च 2017 को अपडेट किया गया