मलेरिया और मलेरिया टीका के उम्मीदवार

जानलेवा मलेरिया पैरासाइट लिए हुए मच्छरों ने हजारों सालों से मनुष्यों से आगे की उड़ान भरी है, और प्रलेखित रिपोर्ट्स में लगभग 2700 B.C. पहले बीमारी होने की पुष्टि हुई है।[1] मलेरिया आज भी मनुष्यों को पीड़ा दे रहा है, जिसके कारण हर साल हजारों लोगों की मृत्यु होती है।

मलेरिया एक प्लाज्मोडियम पैरासाइट के कारण होता है, यह एक-कोशिकीय जीव है जिसमें जीवन की अनेक अवस्थाएं होती हैं और इसे जीवित रहने के लिए एक से अधिक होस्ट की जरूरत होती है। मनुष्यों में बीमारी के लिए पैरासाइट की पांच प्रजातियां जिम्मेदार होती हैं - प्लाज्मोडियम फैल्सिपेरम, पी. वाइवेक्स, पी. ओवेल, पी. मलेरीऔर पी. नोलेल्सी। प्लाज्मोडियम फैल्सिपेरम मनुष्यों के लिए सबसे खतरनाक स्ट्रैन होता है और आज यह अधिकांश वैज्ञानिक शोधकार्यों के निशाने पर है। वर्ष 2002 में, वैज्ञनिकों ने पी. फैल्सीपेरम जेनोमके अनुक्रमण में सफलता पाई, जिससे शोधकर्ताओं को इसे लक्षित करने की विधियों को बेहतर तरीके से समझने में बड़ी कामयाबी मिली।[2]

मलेरिया नाम मलेरिया, से लिया गया जो “दूषित हवा” के लिए इटालियन शब्द है। 1800 के दशक के उत्तरार्ध में रोगाणु सिद्धांत के विकास से पहले, अनेक लोग यह सोचा करते थे कि रोग miasmas या दूषित हवा से फैलते हैं। सन 1897 तक, ब्रिटिश फिजीशियन रोनाल्ड रॉस ने एक खोज की कि रोगों के प्रसार के लिए मच्छर वेक्टर (वाहक) होते हैं। इसके बाद वैज्ञानिकों ने पाया कि केवल मादा मलेरिया का मच्छर पैरासाइट का प्रसार करते हैं (नर मच्छर खून नहीं पीते)। मलेरिया का मच्छरों की 60 विभिन्न प्रजातियों की मादा मच्छरें मलेरिया वेक्टर का काम करती हैं।[3]

109 से अधिक देशों में प्रलेखित मामलों और अफ्रीका की उच्च मृत्यु दर (आकलन के मुताबिक सभी मौंतों का 89%) के साथ दुनिया की आधी से अधिक आबादी उन क्षेत्रों में रहती है जो मलेरिया के लिए अतिसंवेदनशील हैं। लगभग 22 करोड़ लोगों को हर साल पैरासाइट से संक्रमित होते हैं। इतना ही नहीं, पांच वर्ष से कम आयु के बच्चे, गर्भवती महिलाएं, और HIV/AIDS से ग्रसित व्यक्तियों में रुग्णता और मौंत का जोखिम अधिक होता है।[4]

मलेरिया के लंबे इतिहास में इसे पराजित करने के अनेक ऐतिहासिक प्रयास किए गए हैं। क्विनाइन, जो सिनकोना पेड़ की छाल से निकाला गया एक पदार्थ है, को 1600 के दशक से मलेरिया के खिलाफ एक प्रभावकारी पदार्थ के रूप में जाना जाता रहा है।[5] मलेरिया के प्रसार में मच्छरों की भूमिका का पता चलने के बाद, वैज्ञानिकों ने वेक्टर नियंत्रण पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने अनुमान लगाया कि वेक्टर को मारकर, वे संक्रमण के चक्र को रोक सकते हैं। परिणामस्वरूप, 1900 के दशक के मध्य में DDT और अन्य कीटनाशी प्रचलन में आए और तब से लेकर आज तक इनका प्रयोग किया जा रहा है। सोते हुए लोगों को मच्छरों के काटने से बचाने के लिए बिस्तर पर मच्छरदानी लगाना वेक्टर कंट्रोल की दूसरी विधि है जो न केवल प्रभावी है बल्कि किफायती भी है।[6] आखिरकार, अनेक विभिन्न एंटी-मलेरिया दवाओं के विकास ने यात्रियों के मलेरिया-महामारी वाले देशों यात्रा से जुड़े जोखिमों को देखने का नजरिया बदल दिया।[7] दरअसल, संभवत: उपरोक्त सभी उपायों के कारण, मलेरिया के कारण होने वाली मौंतों में 13% की कमी आई, जो 2000 में 755,000 से घटकर 2010 में 655,000 हुई।[8] बीमारी के मामलों में भी कमी आई, जो 2000 में 223 मिलियन और 2010 में 216 मिलियन हो गए।

इन सभी विकासों के बावजूद भी मलेरिया क्यों एक समस्या बना हुआ है? दवाओं और कीटनाशकों के खिफाल प्रतिरोकता का आविर्भाव एक बड़ी चिंता का विषय है। मलेरिया पैरासाइट 50,000 से अधिक वर्षों से अस्तित्व में है, और प्राकृतिक चयन उत्परिवर्तनों के साथ जीव के स्ट्रैंस को प्रोत्साहित करता है जिससे उन्हें संकटों से बचने में मदद मिलती है। आज हम अधिक से अधिक ड्रग-प्रतिरोधी पैरासाइट और कीटनाशी-प्रतिरोधी मच्छर देख रहे हैं। मलेरिया की रोकथाम के अगले युग में वैश्विक प्रयास जारी हैं : ऐसे मलेरिया टीकों का निर्माण जिसमें अनगिणत जीवन को बचाने की क्षमता हो और मूलभूत रूप से इस ऐतिहासिक गंभीर स्थिति को जड़ से मिटाने में मदद कर सके।

प्लाज्मोडियम जीवन चक्र

 मलेरिया ऐसे किसी भी संक्रामक रोग से अलग है जिसके लिए हमने पहले ही सफलतापूर्वक टीके का निर्माण किया है। इन भिन्नताओं के सबसे मुख्य बात यह है कि मलेरिया एक पैरासाइट के जरिए प्रसारित होता है जो जीवन की अनेक अवस्थाओं से होकर गुजरता है, इनमें से प्रत्येक टीका निर्माताओं के लिए अलग चुनौती पेश करता है। प्लाज्मोडियम जीवन चक्र तीन दो अलग-अलग वर्गों बांटा जा सकता है – पहले दो वर्गों में, पैरासाइट होस्ट के शरीर में अलैंगिक प्रजनन करता है, और तीसरे वर्ग में, यह मच्छर वेक्टर के आंत में लैंगिक प्रजनन करता है। चूंकि पैरासाइट अलैंगिक और लैंगिक दोनों विधि से प्रजनन कर सकता है, इसलिए इसे उन वायरस और बैक्टीरिया के ऊपर बढ़त मिलती जिनके प्रति हम वर्तमान में टीका लेते हैं।

प्लाज्मोडियम जीवन चक्र की तीन अवस्थाए हैं (1) प्री-एरिथ्रोसाइटिक अवस्था, जिसे लीवर अवस्था के रूप में बेहतर जाना जाता है, या यह मनुष्य की लाल रक्त कोशिकाओं को संक्रमित करने से पहले की अवस्था होती है, (2) एरिथ्रोसाइटिक अवस्था, या रक्त अवस्था जब पैरासाइट लाल रक्त कोशिकाओं को संक्रमित कर रहा होता है, और (3) लैंगिक अवस्था, वह अवस्था जब मच्छर द्वारा पैरासाइट को लिया जाता है और वह पैरासाइट मच्छर के आंत में लैंगिक प्रजनन करता है।

यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि जीवन की प्रत्येक अवस्था का निर्माण संक्रमित मनुष्य या वेक्टर के विभिन्न भाग में होता है। पहला, जब प्लाज्मोडियम से संक्रमित कोई मच्छर मनुष्य होस्ट को काटता है, तो पैरासाइट सीधे लीवर में जाता है। दूसरा, लीवर के अंदर पैरासाइट के वयस्क होते ही, यह रक्तप्रवाह में प्रवेश करता है और रक्त कोशिकाओं पर हमला करता है। अंत में, जब यह अगले होस्ट को संक्रमित करने के लिए तैयार होता है, तब यह दूसरे मादा मलेरिया का मच्छर द्वारा चूसा जाता है और यह मच्छर के आंत में लैंगिक प्रजनन करता है।[9]

इससे पहले कि हम इस बात का विस्तार से अध्ययन करें कि कोई टीका मलेरिया को कैसे रोके, पैरासाइट के जीवन चक्र की अवस्थाओं का अध्ययन करना महत्वपूर्ण है। पहला रूप स्पोरोजोआइट (उच्चारण spore-o-zo-ite) कहलाता है। जब किसी मच्छर में पैरासाइट मौजूद होता है और वह किसी व्यक्ति को काटता है तो, पैरासाइट स्पोरोजोआइट के रूप में मानव शरीर में प्रवेश करता है। जैसे ही स्पोरोजोआइट लीवर में पहुंचता है, यह तेजी से लीवर की कोशिकाओं को संक्रमित करना आरंभ कर देता है और अनेक चरणों में अलैंगिक प्रजनन करता है जिससे मेरोजोआइट(उच्चारण mer-o-zo-ites) पैदा होता है। इन सारे परिवर्धन से पैरासाइट के जीवन चक्र के प्री-एरिथ्रोसाइटिक अवस्था का निर्माण होता है। एक स्पोरोजोआइट लगभग 40,000 मेरोजोआइट का अलैंगिक प्रजनन कर सकता है, जो पैरासाइट के नियंत्रण के लिए प्रतिरक्षी तंत्र की क्षमता को चुनौती देने के लिए पर्याप्त बड़ी संख्या है।

एरिथ्रोसाइटिक अवस्था अगली अवस्था है, जो तब उत्पन्न होती है जब मेरोजोआइट लीवर की कोशिकाओं को छोड़कर रक्तप्रवाह में प्रवेश करते हैं। यहां, मेरोजोआइट लाल रक्त कोशिका को संक्रमित करता है और अलैंगिक प्रजनन करना आरंभ कर देता है और हजारों नए मेरोजोआइट पैदा करता है। यह वह अवस्था है जब किसी व्यक्ति को लक्षण अनुभव होना शुरु हो जाता है जैसे मलेरिया से संबंधित समय-समय पर होने वाला बुखार। इसके लक्ष्ण हैं लाल रक्त कोशिकाओं का टूटना, इसी वजह से लक्षण समय-समय पर उत्पन्न होते हैं - जब लाल रक्त कोशिका में मौजूद पैरासाइट प्रजनन करता है, बुखार में कमी आती है और रोगी को सुधार होता हुआ महसूस होता है, लेकिन यह दुबारा शुरू होता है जब मेरोजोआइट मुक्त होते हैं।

तीसरी अवस्था में, या लैंगिक अवस्था में, कुछ मेरोजोआइट संक्रमित रक्त कोशिकाएँ अलैंगिक प्रजनन बंद कर देती हैं और इसके बदले पैरासाइट के लैंगिक रूपों में परिपक्व हो जाती हैं - जिसे नर और मादा गैमेटोसाइट्स (जननाणु) कहा जाता है। माइक्रोसोकोप में पी. फैल्सिपेरम गैमेटोसाइट्स को उनके केले की आकृति द्वारा विभेदित किया जा सकता है। जब कोई मलेरिया का मच्छर उस व्यक्ति को काटता है जिसे मलेरिया है, तब मच्छर रक्त के साथ-साथ गैमेटोसाइट्स भी लेता है। ये गैमेटोसाइट्स तब मच्छर के आंत में वयस्क लिंग कोशिकाएं या गैमेट्स में विकसित होते हुए लैंगिक प्रजनन करने के लिए तैयार हो जाते हैं, और अंत में घुलकर ओसिस्ट (oocyst) बन जाते हैं जैसे ही वे मच्छर के आंत की दीवार पर जाते हैं। ओसिस्ट वृद्धि करता है, विभाजित होता है और आखिरकार फटकर हजारों अगुणित (हैप्लॉइड) स्पोरोजोआइट्स का निर्माण करता है, जो मच्छर की लार ग्रंथियों में गमन करते हैं जिससे वे मच्छर के अगले रक्तपान के दौरान किसी दूसरे व्यक्ति को काटने पर उस व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। (यदि आप याद करें तो स्पोरोजोआइट पैरासाइट का एक रूप है जो लीवर को संक्रमित करता है।) इस प्रकार पैरासाइट का जीवन चक्र पूर्ण होता है, जिससे मलेरिया लगातार फैलता रहता है और दुनिया भर के लोगों को संक्रमित करता है।[10]

मलेरिया का टीका: पैरासाइट के खिलाफ प्रतिरक्षात्मक उपागम

प्लाज्मोडियम का जटिल जीवन चक्र मलेरिया के टीका के निर्माण में एक चुनौती पेश करता है। शोधकर्ताओं को यह अवश्य तय करना चाहिए कि पैरासाइट के जीवन की किस अवस्था को लक्ष्य बनाना चाहिए, या टीका में एक से अधिक जीवन चक्र को निशाना बनाने वाले तत्वों को शामिल किया जाए या नहीं। हालांकि, हालिया खोजों से हम एक प्रभावकारी मलेरिया टीका की संभावना के प्रति आशांवित होना चाहिए।

मलेरिया अनेक उन बीमारियों से थोड़ा अलग है जिनके लिए हम अभी टीका लेते हैं क्योंकि यह तथाकथित जीवाणुरहित प्रतिरक्षण प्रदान नहीं करता। इसका अर्थ है कि यदि आप मलेरिया से बीमार होते हैं और ठीक हो जाते हैं, तो भी आप बार-बार संक्रमित हो सकते हैं। तथ्य यह है कि आपका प्रतिरक्षी तंत्र जिसने पूर्व में मलेरिया के ऊपर प्रतिक्रिया दिखाई, वह भविष्य में होने वाले संक्रमण के प्रति सुरक्षा प्रदान नहीं करेगा। यह खसरा जैसी बीमारी से बहुत भिन्न है : बहुत से लोग जिन्हें खसरा हुआ होता है वे जीवन भर भविष्य के खसरे से प्रतिरक्षित रहेंगे। मलेरिया के साथ एक सीमा तक प्राकृतिक रूप से अर्जित प्रतिरक्षा क्षमता के कुछ साक्ष्य होते हैं - जिस व्यक्ति को पूर्व में मलेरिया हुआ होता है उसे अभी भी हो सकता है, लेकिन रुग्णता की तीव्रता शायद कम होगी। अनेक अफ्रीकी देशों में जहां मलेरिया एक आम बात है, अधिकांश लोग जिन्हें मलेरिया दुबारा होता है, वे आंशिक अर्जित प्रतिरक्षी क्षमता के कारण हल्का लक्षण महसूस करते हैं। यह भी एक कारण है कि मलेरिया 5 से कम वर्ष की आयु के बच्चों के लिए बहुत जानलेवा होता है। इन बच्चों में इस आयु तक पैरासाइट के प्रति किसी स्तर की कोई अर्जित प्रतिरक्षी क्षमता नहीं होती, और उन्हें गंभीर स्थिति झेलने की संभावना अधिक होती है जिससे घातक जटिलताएं हो सकती हैं। इतना ही नहीं, इसी कारण से जिन विदेशियों को कभी मलेरिया नहीं हुआ है उन्हें बहुत सावधान रहना चाहिए - पहली बार संक्रमित होने पर गंभीर स्थिति उत्पन्न हो सकती है। अंत में, प्राकृतिक रूप से अर्जित प्रतिरक्षी क्षमता अधिक दिनों तक नहीं टिकती। दरअसल, जब कोई व्यक्ति अपना संपूर्ण जीवन अफ्रीका में बिताता है और यदि एक साल के लिए भी अफ्रीका छोड़ता है तो, वह अपना आंशिक अर्जित प्रतिरक्षी क्षमता खो बैठेगा और एक बार फिर मलेरिया के लिए मलेरिया के प्रति संवेदनशील हो जाएगा जैसे कि उसे पहले कभी मलेरिया नहीं हुआ था।[11] इसलिए, मलेरिया के टीके के विकास के लिए एक अभिगम आंशिक प्रतिरक्षी क्षमता की क्रियाविधि को समझना और उस सिद्धांत के आधार पर टीके का निर्माण हो सकता है।

दूसरा रास्ता जिसने मलेरिया के टीका के शोधकर्ताओं को दिशा दी है वह है संपूर्ण पैरासाइट को इसके स्पोरोजोआइट रूप में सक्रिय रूप से दुर्बलीकृत (कमजोर) पैरासाइट के साथ प्रतिरक्षण की अवधारणा। सन 1967 के अध्ययन में इस विचार को सहारा मिला जिसमें नुसेंजविग और अन्य ने चूहों को रेडिएशन-अटेन्युएटेड प्लाज्मोडियम बर्गी (मलेरिया का गैर-मानव रूप) स्पोरोजोआइट से प्रतिरक्षित किया और देखा कि चूहे संक्रामक स्पोरोजोआइट्स के साथ बाद की चुनौती में सुरक्षित रहे।[12]

2002 में इस आइडिया को मनुष्यों में अपनाते हुए, हॉफमैन और अन्य ने दर्शाया कि वे संक्रमित ऐनोफेजील मच्छरों के अंदर मौजूद स्पोरोजोआइट को दुर्बल बनाने के लिए गामा रेडिएशन का इस्तेमाल किया जा सकता है, और इस प्रकार मनुष्यों को पूरी तरह से सुरक्षित किया जा सकता है। मनुष्यों को संक्रमित मच्छरों से कटाया गया, जिसने इरेडिएशन वाले स्पोरोजोआइट्स को मनुष्य के शरीर में डाला। स्पोरोजोआइट्स ने लीवर कोशिकाओं में प्रवेश किया, लेकिन आगे परिपक्व नहीं हो पाए। ये दुर्बल स्पोरोजोआइट्स अब भी मानव होस्ट में प्रतिरक्षी प्रतिक्रिया प्राप्त करने में सक्षम थे, लेकिन चूंकि वे लीवर से आगे विकसित नहीं हो पाए इसलिए होस्ट बीमार नहीं हुआ। परिणामस्वरूप, अगली बार एक संक्रमित मच्छर ने प्रतिरक्षित व्यक्ति का रक्तपान किया और प्लाज्मोडियम स्पोरोजोआइट वाले व्यक्ति में इंजैक्ट किया, प्रतिरक्षी तंत्र को खतरे का आभास हुआ और इससे पहले कि पैरासाइट बीमारी बनता उसका उन्मूलन कर दिया।

इरेडिएशन के इस उपागम की दो खामियां थी: यह किफायती नहीं था और बड़े पैमाने पर व्यावहारिक नहीं था।[13] इसके बावजूद यह सिद्धांत का एक प्रमाण बना, जिससे वैज्ञानिकों को भविष्य के लिए उम्मीद जगी और इस क्षेत्र में बड़े शोध को प्रेरित करने में मदद मिली।

वर्तमान शोध

वैज्ञानिकों ने 2002 में अध्ययन के खोजों को आगे बढ़ाया ताकि अनेक संभावित मलेरिया टीकों का निर्माण किया जा सके। सक्रिय दुर्बलीकृत टीके के बदले, आज बहुत से वैज्ञानिक विशिष्ट एंटीजन को अलग करने और टीका में डालने की तकनीकों पर काम कर रहे हैं।[14] और चूंकि पैरासाइट के जीवन की तीन विभिन्न अवस्थाएं होती हैं, इसलिए तीन अलग-अलग टीका उपागमों की जांच की जा रही है।

प्री-एरिथ्रोसाइटिक के टीके संक्रामक फेज को लक्षित करते हैं और इनका लक्ष्य स्पोरोजोआइट्स को लीवर कोशिकाओं में जाने से रोकने या संक्रमित लीवर कोशिकाओं को नष्ट करना होता है।[15] प्री-एरिथ्रोसाइटिक टीका का सबसे महत्वपूर्ण चुनौती है समय सीमा: स्पोरोजोआइट्स, संक्रमित मच्छर द्वारा इंजैक्ट करने के बाद एक घंटे के अंदर लीवर में पहुंच जाता है। परिणामस्वरूप, प्रतिरक्षी तंत्र के पास पैरासाइट को नष्ट करने के लिए सीमित समय होता है। हालांकि बहुत से संभावित प्री-एरिथ्रोसाइटिक टीके अभी भी फेज I या फेज II ट्रायल में हैं, वर्तमान में एक टीका फेज III ट्रायल में और यह भरोसा दिखा रहा है : RTS,S टीका। (ध्यान दें कि फेज I अध्ययन सुरक्षा का मूल्यांकन करता है, फेज II खुराक का परीक्षण करता है, और फेज III समग्र प्रभावकारिता का मूल्यांकन करता है।[16]

RTS,S टीका का निर्माण करने के लिए, निर्माताओं ने प्रोटीन की पहचान की जो 2002 के इरेडिएटेड स्पोरोजोआइट ट्रायल में सुरक्षा के लिए जिम्मेदार था। इस एंटीजन को सर्कमस्पोरोजोआइट प्रोटीन, या CS प्रोटीन के नाम से जाना जाता है। हालांकि, यह एंटीजन सुरक्षात्मक है, इसलिए यह अपने आप में बहुत इम्युनोजेनिक नहीं होता है, अर्थात यह प्रतिरक्षी प्रक्रिया को उत्तेजित करने के लिए बहुत अच्छा नहीं होता। इसलिए, वैज्ञानिकों ने CS प्रोटीन से प्राप्त एंटीजन के साथ हेपाटाइटिस B सर्फेस एंटीजन (हेपाटाइटिस B टीका में सुरक्षा प्रदान करने के लिए जिम्मेदार एंटीजन) पर ध्यान दिया। यहां तक कि आगे भी प्रतिरक्षी तंत्र को उत्तेजित करने के लिए, वैज्ञानिकों ने एक यौगिक का निर्माण किया जिसे एडजवंट (सहायक) कहा जाता है, जो एंटीजन के खिलाफ प्रतिरक्षी तंत्र की प्रतिक्रिया को बढ़ाता है। उद्देश्य होता है स्पोरोजोआइट्स को लीवर कोशिका में प्रवेश करने से रोकने और विशेष संक्रमित कोशिकाओं को नष्ट करने, दोनों के लिए उच्च स्तर के एंटीबॉडीज को शामिल करना।

RTS,S टीका का परीक्षण 11 विभिन्न अफ्रीकी देशों में फेज III ट्रायल में किया गया था। इन ट्रायलों में कुछ सफलता मिली थी। अक्टूबर 2011 में जारी शुरुआती परिणामों, से ह पता चला कि RTS,S से प्रतिरक्षित 5-17 वर्ष से कम आयु के बच्चों में क्लिनिकल मलेरिया और गंभीर मलेरिया के जोखिम में क्रमश: 56% और 47% की कमी आई।[17] हालांकि, 2012 में जारी परिणामों में, पहले टीकाकरण पर 6-12 साल के नवजातों में टीका कम प्रभावी था। उस समूह में, RTS,S के टीकाकरण से क्लिनिकल और गंभीर दोनों मामलों में एक-तिहाई की कमी आई। ट्रायल से प्राप्त अंतिम परिणामों में, जिसे लगभग तीन वर्ष के बच्चों पर आजमाया गया, प्रदर्शित हुआ कि पहले टीकाकरण से क्लिनिकल मलेरिया के मामलों में छोटे बच्चों में 26% की कमी आई और 17 महीने के बच्चों में 36% की कमी आई।[18] जुलाई 2015 में यूरोपियन मेडिसिंस एजेंसी ने अनुशंसा की कि अफ्रीका में छोटे बच्चों में इस्तेमाल के लिए टीका को लाइसेंस प्रदान किया जाना चाहिए; विश्व स्वास्थ्य संगठन टीका पर की गई अनुशंसा पर विचार कर रहा है। इस बीच, विश्व स्वास्थ्य संगठन सलाहकार समूह ने कुछ सब-सहारन अफ्रीकी देशों में टीका के पायलट क्रियान्वयन की अनुशंसा की।[19] यूएसए के वाशिंगटन के सीटल स्थित एक गैर-लाभकारी संगठन मलेरिया वैक्सिन इनीशिएटिव RTS,S के मुख्य निर्माता को वर्ष 2025 तक 80% तक प्रभावी टीके के निर्माण की उम्मीद है।[20]

अन्य अनेक प्री-एरिथोसाइटिक टीकों का परीक्षण किया जा रहा है लेकिन किसी से भी RTS,S का भरोसा या सफलता नहीं मिली। वैज्ञानिक RTS,S की प्रभावकारिता को सुधारने के लिए काम कर रहे हैं ताकि प्राइम बूस्ट तकनीकी, एडजवंट, और एंटीजन ऑप्टिमाइजेशन का प्रयोग करके इसे 50% से अधिक प्रभावी बनाया जा सके।[21]

एरिथ्रोसाइटिक, या ब्लड-स्टेज (रक्त अवस्था) के टीके, का उद्देश्य होता है लाल रक्त कोशिकाओं में पैरासाइट के त्वरित हमले या अलैंगिक प्रजनन को रोकना। याद करें कि रक्त अवस्था वह समय है जब लक्षण प्रकट होते हैं और लाल रक्त कोशिकाओं के फटने के कारण यह रोगी के लिए बहुत ही खतरनाक होता है। इस अवस्था में विशाल संख्या में मेरोजोआइट्स का निर्माण होने के कारण - प्रत्येक लीवर कोशिका के लिए 40,000 मेरोजोआइट्स मुक्त होते हैं - ब्लड-स्टेज के टीके का लक्ष्य केवल लाल रक्त कोशिकाओं को संक्रमित करने वाले मेरोजोआइट्स की संख्या को कम करना होता है न कि उनकी गुणन को पूरी तरह से बंद करना।[22] वर्तमान में ऐसे कोई ब्लड-स्टेज के टीक नहीं हैं जिनमें RTS,S की सफलता मिली और अभी भी बहुत से टीकों पर फेज I या II के ट्रायल जारी हैं।

आखिरकार, दूसरे प्रकार का टीका मच्छर की आंत में होने वाले लैंगिक प्रजनन की अवस्था को निशाना बनाता है। इस उपागम को ट्रांसमिशन ब्लॉकिंग वैक्सेन (TBV)  कहा जाता है, क्योंकि इसका लक्ष्य होता है वेक्टर, मलेरिया का मच्छर, को नष्ट करना ताकि पैरासाइट के आगे के प्रसार को रोका जा सके। यह टीका का एक अप्रत्यक्ष उपागम है क्योंकि यह उस व्यक्ति को सीधे तौर पर सुरक्षा नहीं प्रदान करेगा जिसके अंदर पैरासाइट है लेकिन लगातार हो रहे प्रसार को रोकेगा।[23]

एक TBV उम्मीदवार टीका Pfs25-EPA है जिसका निर्माण यूएस नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ एलर्जी एंड इंफैक्सस डिजीज लैबोरेटरी ऑफ मलेरिया इम्युनोलॉजी एंड वायरोलॉजी और हॉन हॉपकिंस युनिवर्सिटी सेंटर फॉर वैक्सिन रीसर्च में किया जा रहा है। इस टीका के पीछे की अवधारणा यह कि यदि शरीर Pfs25 एंटीजन के खिलाफ एंटीबॉडीज विकसित कर सकता है तो, रक्तपान करने वाला मच्छर कुछ एंटीबॉडीज को अपने पेट में रख लेगा। एंटीबॉडीज एंटीजन का मुकाबला करेंगे, जिससे वे विकास में हस्तक्षेप करने में सक्षम होंगे और पैरासाइट को नष्ट करेंगे।[24]

आखिरकार, अनेक वैज्ञानिक मलेरिया टीका के निर्माण के लिए अनेक उपागमों को संयुक्त करने के अगले चरण के बारे में सोचने हैं। लेकिन इन अलग-अलग अवस्थाओं के टीकों को अपने आप में प्रभावकारिता दिखाई होगी इससे पहले कि वैज्ञानिक टीका के संयोजन उपागमों का विकास करे। इसके अलावा, वैज्ञानिकों द्वारा भविष्य में सामना की जाने वाली एक बड़ी चुनौती है कि प्रतिरक्षा के लिए कोई भी ज्ञात सहसंबंध नहीं है, अर्थात टीका की प्रभावकारिता दर्शाने के लिए मनुष्यों में महंगे क्लिनिकल ट्रायल के अलावा दूसरी कोई विधि नहीं है।[25] इस प्रकार यद्यपि बड़ी प्रगति हो चुकी है, इसलिए मलेरिया के टीके का विकास महंगे रहेगा और इसमें बहुआयामी प्रयास किए जाते रहेंगे।


 

1.      CDC. The history of malaria, an ancient disease.  31/3/2017 को प्रयुक्त।

2.      Gardner MJ et al. Genome sequence of the human malaria parasite Plasmodium falciparum. Nature. 2002 Oct 3;419(6906):498-511.  

3.      CDC. The history of malaria, an ancient disease. 31/3/2017 को प्रयुक्त।

4.      WHO. Malaria fact sheet.  31/3/2017 को प्रयुक्त।

5.      Achan J et al. Quinine, an old anti-malarial drug in a modern world: role in the treatment of malaria. Malar J. 2011; 10: 144.  31/3/2017 को प्रयुक्त।

6.      http://info.onlinelibrary.wiley.com/userfiles/ccoch/file/CD000363.pdf 31/3/2017 को प्रयुक्त।

7.      CDC. The history of malaria, an ancient disease.  31/3/2017 को प्रयुक्त।

8.     WHO. 2011 world malaria report. (29 MB). 31/3/2017 को प्रयुक्त।

9.      http://www.malariavaccine.org/malvac-lifecycle.php  31/3/2017 को प्रयुक्त।

10.    http://www.niaid.nih.gov/topics/malaria/pages/lifecycle.aspx  31/3/2017 को प्रयुक्त।

11.    Doolan DL Dobaño C, Baird JK. Table of Contents. Acquired immunity to malaria.  Clin Microbiol Rev. 2009 Jan;22(1):13-36, 31/3/2017 को प्रयुक्त।

12.    Nussenzweig RS, Vanderberg J, Most H, Orton C. Protective immunity produced by the injection of x-irradiated sporozoites of Plasmodium berghei. Nature 1967; 216:160 – 2.

13.    Hoffman et al. Protection of humans against malaria by immunization with radiation-attenuated Plasmodium falciparum sporozoitesJ Inf Dis 185:1155–1164  31/3/2017 को प्रयुक्त।

14.    MVI Website. 31/3/2017 को प्रयुक्त।

15.    http://www.malariavaccine.org/rd-vaccine-candidates.php  31/3/2017 को प्रयुक्त।

16.   http://www.historyofvaccines.org/content/articles/vaccine-development-testing-and-regulation 31/3/2017 को प्रयुक्त।

17.    The RTS,S Clinical Trials Partnership. First results of Phase 3 trial of RTS,S/AS01 malaria vaccine in African childrenN Engl J Med 2011; 365:1863-1875. 31/3/2017 को प्रयुक्त।

18.    Moorthy VS, Okwo-Bele JM. Final results from a pivotal phase 3 malaria vaccine trialLancet.2015;  386:5-7.  से लिया गया। 31/3/2017 को प्रयुक्त।

19.    http://who.int/mediacentre/news/releases/2015/sage/en/ 31/3/2017 को प्रयुक्त।

20.    http://www.malariavaccine.org/rd-research-programs.php 31/3/2017 को प्रयुक्त।

21.    http://www.malariavaccine.org/rd-collaborations.php  31/3/2017 को प्रयुक्त।

22.    http://www.malariavaccine.org/malvac-approaches.php  31/3/2017 को प्रयुक्त।

23.    http://www.malariavaccine.org/malvac-approaches.php 31/3/2017 को प्रयुक्त।

24.    http://www.malariavaccine.org/pr_2011_pfs25.php 31/3/2017 को प्रयुक्त।

25.    http://www.malariavaccine.org/malvac-state-of-vaccine-dev.php 31/3/2017 को प्रयुक्त।

 

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अंतिम अपडेट 31 मार्च 2017