डिप्थीरिया

डिप्थीरिया कॉरीनेबैक्टीरियम डिप्थीरी नामक जीवाणु से पैदा होता है। यह जीवाणु एक शक्तिशाली विष छोड़ता है जिससे शरीर के ऊतकों और अंगों को नुकसान पहुंचता है। हालांकि विकसित देशों में डिप्थीरिया होने की दर काफी कम होती है या न के बराबर होती है, पर यह रोग अभी भी दुनिया भर में अपनी भूमिका निभा रहा है। वर्ष 2000 में दुनिया भर में डिप्थीरिया के लगभग 30,000 मामले दर्ज किए गए और इस रोगे से लगभग 3,000 लोगों की मृत्यु हुई। वर्ष 2010 में दुनिया भर में डिप्थीरिया के 4,187 मामले पाए गए, जो डिप्थीरिया के मामलों की वास्तविक संख्या को कम कर आंकने के कारण हो सकता है।

लक्षण

डिप्थीरिया के प्रारंभिक लक्षण सामान्य जुकाम जैसे होते हैं। उनमें शामिल हैं गले की खराश, भूख की कमी और बुखार आना। रोग के बढ़ने पर डिप्थीरिया के संक्रमण के सबसे स्पष्ट लक्षण उभर सकते हैं: एक मोटा धूसर पदार्थ जिसे छद्म-झिल्ली कहते हैं, नासिका ऊतकों, टॉन्सिल्स, कंठ, और ग्रसनी पर जम सकती है।

छद्म-झिल्ली का निर्माण जीवाणु द्वारा स्रावित विष से जुड़े बेकार उत्पादों और प्रोटीन से होता है। छद्म-झिल्ली उत्तकों से चिपक जाती हैं और ये सांस लेने में बाधा पैदा कर सकती हैं।

प्रसार

डिप्थीरिया का प्रसार एक व्यक्ति से दूसरे में सांस के नन्हें बूंदों द्वारा होता है। यदि संक्रमित व्यक्ति का इलाज एंटीबायोटिक्स से न किया जाए तो यह दो या तीन हफ्तों तक संक्रामक बना रहता है। 

उपचार तथा देखभाल

डिप्थीरिया के इलाज में शामिल है डिप्थीरिया के जीवाणु को मारने के लिए एंटिबायोटिक्स का इस्तेमाल करना और साथ उस जीवाणु द्वारा स्रावित विषों के प्रभाव को खत्म करने के लिए एंटीटॉक्सिन का प्रयोग करना। अन्य व्यक्तियों को संक्रमित करने की स्थिति तक डिप्थीरिया के रोगियों को अलग कर रखा जाता है, और प्रायः एंटीबायोटिक्स उपचार के आरंभ होने के 48 घंटों के बाद वे संक्रमण मुक्त हो जाते हैं।

जटिलताएं

डिप्थीरिया का विष हृदय, पेशियों, गुर्दों और यकृत तक पहुंच सकता है, जहां यह स्थायी या स्थायी रूप से इन अंगों को नुकसान पहुंचा सकता है। डिप्थीरिया की जटिलताओं में शामिल हो सकते हैं माइयोकार्डाइटिस (हृदय पेशियों की क्षति), न्युट्राइटिस (तंत्रिकाओं की सूजन, जिससे तंत्रिका को नुकसान पहुंच सकता है), पक्षाघात, श्वसन की खराबी और न्युमोनिया), वायुमार्ग का बाधित होना और कान का संक्रमण।

डिप्थीरिया के मामलों में पांच वर्ष से कम की आयु वाले बच्चों में मृत्यु दर 20% तथा 5-40 वर्ष की आयु वाले व्यक्तियों में 5-10% होती है।

उपलब्ध टीके

डिप्थीरिया के टीके में टॉक्सॉयड (डिप्थीरिया के विष का एक संशोधित संस्करण) शामिल होते हैं। डिप्थीरिया टॉक्सॉयड एकल ख़ुराक के रूप में नहीं दिया जाता है, बल्कि इसे टिटनस टॉक्सॉयड और कई बार कुकुर खांसी के टीके के साथ संयुक्त रूप से दिया जाता है जिसे DT, DTaP, DTwP, Td, या Tdap कहा जाता है। कुछ मामलों में डिप्थीरिया का विष अन्य संयोजन टीकों में दिया जा सकता है।

1920 के दशक में प्रभावी प्रतिरक्षण के आने के बाद से इसके टीके का इस्तेमाल करने वाले देशों में डिप्थीरिया की दर में काफी तेजी से कमी आयी है। वर्ष 1974 में डिप्थीरिया प्रतिरक्षण में तब विस्तार हुआ जब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने विकासशील देशों के लिए चलाए जाने वाले प्रतिरक्षण के विस्तारित कार्यक्रम के लिए अपनी अनुशंसित प्रतिरक्षण सूची में डिप्थीरिया टॉक्सॉयड को शामिल किया।

टीकाकरण के सुझाव

विश्व स्वास्थ्य संगठन(WHO) टीके वाले डिप्थीरिया टॉक्सॉयड की 3 ख़ुराकों की एक प्राथमिक सीरीज की अनुशंसा करता है, जिसे 6 हफ्तों की आयु से ही दिया जा सकता है। कई देशों में 6 वर्ष की आयु से लेकर किशोरावस्था तक बूस्टर ख़ुराक दी जाती है।

वयस्कों को डिप्थीरिया टॉक्सॉयड टिटनस टॉक्सॉयड बूस्टर के साथ संयोजन में दिया जा सकता है, जिसे डब्ल्युएचओ प्रारंभिक बाल्यावस्था में सुझाता है।


स्रोत

सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन। Diphtheria. In Epidemiology and Prevention of Vaccine-Preventable Diseases. Atkinson W, Wolfe S, Hamborsky J, McIntyre L, eds. 13th ed. Washington DC: Public Health Foundation, 2015. (379 KB). 20/3/2017 को प्रयुक्त

विश्व स्वास्थ्य संगठन। Diphtheria. 20/3/2017 को प्रयुक्त

विश्व स्वास्थ्य संगठन। Diphtheria vaccines: WHO position paper. January 2006. 20/3/2017 को प्रयुक्त।

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अंतिम अपडेट 20 मार्च 2017